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बेटे भी घर छोड़ जाते हैं

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बेटे भी घर छोड़ जाते हैं – Poem – I

बेटे भी घर छोड़ जाते हैं
दुनिया की भीड़ में खो जाते हैं

अपनी जान से ज़्यादा प्यारा desk top छोड़ कर
अलमारी के ऊपर धूल खाता गिटार छोड़ कर
Gym के dumbles, और बाकी gadgets
मेज़ पर बेतरतीब पड़ी worksheets, pens और pencils बिखेर कर
बेटे भी घर छोड़ जाते हैं
दुनिया की भीड़ में खो जाते हैं

मुझे ये colour /style पसंद नहीं
कह कर brand new शर्ट अलमारी में छोड़ कर
Graduation ceremony का सूट, जस का तस
पुराने मोज़े, बनियान , रूमाल, (ये भी कोई सहेज़ के रखने वाली चीज़ है )
सब बेकार हम समेटे हैं, उनको परवाह नहीं
बेटे भी घर छोड़ जाते हैं
दुनियां की भीड़ में खो जाते हैं

जिस तकिये के बिना नींद नहीं आती थी
वो अब कहीं भी सो जाते हैं
खाने में नखरे दिखाने वाले अब कुछ भी खा कर रह जाते हैं
अपने room के बारे में इतनेpossessive होने वाले
अब रूम share करने से नहीं हिचकिचाते
अपने career बनाने की ख्वाहिश में
बेटे भी माँ बाप से बिछड़ जाते हैं
दुनिया की भीड़ में खो जाते हैं

घर को मिस करते हैं, पर कहते नहीं
माँ बाप को ‘ठीक हूँ ‘कह कर झूठा दिलासा दिलाते हैं
जो हर चीज़ की ख्वाहिशमंद होते थे
अब ‘कुछ नहीं चाहिए’ की रट लगाये रहते हैं
जल्द से जल्द कमाऊ पूत बन जाने की हसरत में
बेटे भी घर छोड़ जाते हैं
दुनियां की भीड़ में खो जाते हैं

हमें पता है,
वोअब वापस नहीं आएंगे, आएंगे तो छुट्टी मनाने
उनके करियर की उड़ान उन्हें दूर कहीं ले जाएगी
फिर भी हम रोज़ उनका कमरा साफ़ करते हैं
दीवारों पर चिपके पोस्टर निहारते हैं
संजोते हैं यादों में उन पलों को,
जब वो नज़दीक थे, परेशान करते थे
अब चाह कर भी वो परेशानी नसीब में नहीं
क्योंकि
बेटे भी घर छोड़ जाते हैं
दुनियां की भीड़ में खो जाते हैं

bete bhi ghar chhod kar jate he
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बेटे भी घर छोड़ जाते हैं – Poem – II

“हर उस बेटे को समर्पित जो घर से दूर है”

बेटे भी घर छोड़ जाते हैं
जो तकिये के बिना कहीं…भी सोने से कतराते थे…

आकर कोई देखे तो वो…कहीं भी अब सो जाते हैं…

खाने में सो नखरे वाले..अब कुछ भी खा लेते हैं…

अपने रूम में किसी को…भी नहीं आने देने वाले…

अब एक बिस्तर पर सबके…साथ एडजस्ट हो जाते हैं…

बेटे भी घर छोड़ जाते हैं.!!
घर को मिस करते हैं लेकिन…कहते हैं ‘बिल्कुल ठीक हूँ’…

सौ-सौ ख्वाहिश रखने वाले…अब कहते हैं ‘कुछ नहीं चाहिए’…

पैसे कमाने की जरूरत में…वो घर से अजनबी बन जाते हैं

लड़के भी घर छोड़ जाते हैं।
बना बनाया खाने वाले अब वो खाना खुद बनाते है,

माँ-बहन-बीवी का बनाया अब वो कहाँ खा पाते है।

कभी थके-हारे भूखे भी सो जाते हैं।

लड़के भी घर छोड़ जाते है।
मोहल्ले की गलियां, जाने-पहचाने रास्ते,

जहाँ दौड़ा करते थे अपनों के वास्ते,,,

माँ बाप यार दोस्त सब पीछे छूट जाते हैं

तन्हाई में करके याद, लड़के भी आँसू बहाते है

लड़के भी घर छोड़ जाते हैं
नई नवेली दुल्हन, जान से प्यारे बहिन- भाई,

छोटे-छोटे बच्चे, चाचा-चाची, ताऊ-ताई ,

सब छुड़ा देती है साहब, ये रोटी और कमाई।

मत पूछो इनका दर्द वो कैसे छुपाते हैं,

बेटियाँ ही नही साहब, बेटे घर छोड़ जाते हैं

जरा भी दिल को छुआ है तो शेयर कर लेना प्लीज।

दूर बैठे अपने भाई के लिए, पापा के लिए, पति के लिए और बेटे के लिए प्लीज शेयर।

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बेटे भी आजकल विदा ही हो जाते हैं – Poem III

बेटे भी आजकल विदा ही हो जाते हैं
दे कर माँ बाप को एक कागज़ का टुकड़ा,
जिस पर लिखा होता है एक फोन नंबर।
जल्दी जल्दी घर आने की एक दिलासा,
और सेट होते ही अपने पास बुला लेने का एक आशा।
वो कमरा अब अक्सर खाली रहता है
बस दीवारों पर चिपके तेंदुलकर और ब्रूस ली
आपस में बतिया लेते हैं कभी।
हिन्दी और इंग्लिश गानों की कैसेट्स
जिनसे चिढ़ कर माँ फेंक देने की धमकी देती थीं
आज भी बाकायदा साफ़ होती हैं कपड़े से।
घर में सालों से रखे हैं अब भी
स्टोर रूम में एक बैट और दो रैकेट।
छत के टीन शेड में वो ज़ंग लगी साइकिल भी
जिसकी चैन ना जाने कितनी बार पिताजी ने चढाई थी।
आँगन में वो पुरानी बाइक आज भी एक पुरानी चादर से ढकी है
जिसे ज़िद करके कितनी दफा
मैकेनिक के पास भेजा गया था मॉडिफाइड करने।
डम्बल और लकड़ी की बेंच
आज भी माँ ने कबाड़ी को नहीं बेचे,
और छत के कड़े से चेन बाँध कर
कसरत करने का जुगाड़ जो अब पेंडुलम सा हिलता रहता है,
शायद समय को आगे नहीं पीछे और पीछे अतीत में ले जाता है रोज़।
…बेटे भी तो विदा हो ही जाते हैं आजकल…

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